संवाददाता दिल्ली : भारत जैसे विकासशील गणतंत्र में मानवाधिकारों के संरक्षण की बात की जाए तो अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर भारत में मानवाधिकर हनन आम बात है, शिक्षा के आभाव में भारत के 80 प्रतिशत से अधिक नागरिक आज भी अपने अधिकारों के बारे में नहीं जानते है ना ही भारत की शिक्षा प्रणाली में मानवाधिकारों का विस्तार से कोई वर्णन मिलता है यह कहना सही है की विश्व में कई ऐसे देश भी है जंहा अशिक्षा और पूंजीवाद के दम पर मानवाधिकारों का दम निकाल दिया गया है उदाहरण जैसे अफगानिस्तान, इराक, ईरान, उत्तरी कोरिया जैसे कई देश है परन्तु भारत की स्थिति भी सम्मानजनक नहीं है।

देश में आज भी जातिवाद चरम पर है जोकि मानवाधिकारों का सर्वाधिक हनन करता है जिसके कारण आए दिन ग्रामीण क्षेत्रों में किसी विशेष जाति वर्ग के नागरिकों को बारात नहीं निकालने देना, घोड़ी पर नहीं बैठने देना, शमशान में अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं देना, नलकूपों से पानी नहीं देना, महिलाओं को स्कूल नहीं भेजना, शादी के बाद महिलाओं को प्रताड़ित करना, दहेज़ के लिए प्रताड़ित करना, महिलाओं को समान नहीं मानना, बंधुआ मजदूरी, मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश बंद करना आदि कई आम घटनाएँ है जो प्रतिदिन भारतीय समाचार पत्रों में देखने के लिया मिल जाती है।

भारत राष्ट्र ने भी अंतर्राष्ट्रीय नियमों का आचरण करते हुए भारत में 12 अक्टूबर 1993 को संयुक्त राष्ट्र की तर्ज पर मानवाधिकारों को संविधान में शामिल किया और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की एवं बाद में सभी राज्यों ने भी राज्य मानवाधिकार आयोग की स्थापना की परन्तु प्रकरणों में विलम्ब और जाँच में पारदर्शिता ना होने के कारण आज भी भारत के नागरिक इस आयोग से दूर ही रहते है कहने का आशय त्वरित न्याय आज भी भारत में “दूर के ढोल सुहावने लगते है” वाली कहावत है। अगर आपके मानवाधिकारों का गंभीर हनन पुलिस द्वारा, समाज द्वारा, परिवार द्वारा, शासन-प्रशासन द्वारा होता भी है और आप मानवाधिकार आयोग में शिकायत भी करते है तो मिलता है केवल शिकायत नंबर इसके बाद क्या कार्यवाही हुई या कब तक कार्यवाही हो जाएगी आयोग पर कोई बंधन नहीं है यह सब देखकर शिकायतकर्ता भी न्याय की आस छोड़कर अपने आप से समझोता कर लेता है।

साथ ही मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को संरक्षण नहीं मिलने के कारण भी कई मामले परदे के पीछे ही रह जाते है निष्पक्ष मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को फर्जी प्रकरण बनाकर जेल में डालना उनकी हत्या कर देना जैसे समाचार आपको न्यूज में प्रतिदिन देखने को मिल जाते है सरकार भी उन्हें कोई मुआवजा या बिमा प्रदान नहीं करती है जिसके कारण मानवाधिकार कार्यकर्ता भी डर जाते है और अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पाते है उदहारण “मलाल युसूफ रजई” (पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता और स्वरा भास्कर भारतीय मानवाधिकार कार्यकर्ता आपने सामने है उनका जो हाल किया गया था उसका परिणाम जानकर किसी भी मानवाधिकार कार्यकर्ता के रोंगटे खड़े हो सकते है सरकार को चाहिए की मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को संरक्षण प्रदान करे तब कंही न कंही निष्पक्ष न्याय हो सकता है यही हाल भारतीय पत्रकारों का भी है।

इसी आवश्यकता की पूर्ति और लोगो को न्याय दिलाने के लिए कुछ नॉन गवर्मेंट ऑर्गेनाइजेशन (एनजीओ) आगे आये और त्वरित न्याय की मांग हुई और भारतीय नागरिकों में फिर से न्याय की उम्मीद जाग उठी इन संस्थाओं ने भारत के लाखों नागरिकों की क़ानूनी और आर्थिक सहायता कर उन्हें न्याय दिलाया और भारतीय न्याय व्यवस्था पर भारतीय नागरिकों का भरोसा बनाये रखा है इसी क्रम में भारत में “राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं अपराध नियंत्रण ब्यूरो” (NHRCCB) एक एनजीओ की स्थापना वर्ष 2017 में झारखण्ड के एक शिक्षित युवा डॉ रणधीर कुमार द्वारा की गई यह संस्था आज भारत के लगभग 25 राज्यों में कार्यरत है और इस संस्था ने भारत के हजारों पीड़ित नागरिकों को न्याय दिलाया और न्याय दिलाने का प्रयास किया है जो वर्तमान में भी जारी है।

सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय मानवाधिकार एवं अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने बाल श्रम, शासकीय संस्थाओं में कर्मचारियों की अनियमितताओं, सरकार के गलत फैसलों, महिला अधिकारों आदि जैसे देश की गंभीर समस्याओं पर कार्य करते हुए देश में अपनी एक अलग ही पहचान स्थापित की है। संस्था ने न्यायालयों में जनहित याचिकाएं दर्ज कर और शासन – प्रशासन के माध्यम से मानवाधिकार हनन के विरूद्ध हजारों ऐसे कार्य किये है जिसके लिए शासकीय विभाग और न्यायलय भी संस्था का सहयोग और समर्थन करते रहे है।

इसी कार्य को देश के अंतिम नागरिक तक पहुँचाने और संस्था में बेहतर कार्य करने वाले पदाधिकारियों के सम्मान हेतु व अपने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए संस्था दिनांक 30 जुलाई 2022 को होटल द अशोक चाणक्यपुरी दिल्ली में एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन करने जा रही है जिसमे देश – विदेश से मानवाधिकार से सम्बन्ध रखने वाले कई कार्यकर्ता और अथिति शामिल होंगे।

प्राप्त जानकारी के अनुसार संस्था ने कई राज्यों के न्यायाधीश, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्यों, राज्य महिला आयोग के सदस्यों, श्रम आयोग के सदस्यों, कई पद्मश्री अवार्डी, प्रशासनिक अधिकारीयों, विदेशी नागरिकों व मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम में अमंत्रित किया है और कई हस्तियों का आना निश्चित हुआ है संस्था का इतना बड़ा अधिवेशन करना कंही न कंही शासन – प्रशासन से बेहतर सामंजस्य बनाना और उसके माध्यम से पीड़ित भारतीय नागरिकों को न्याय दिलाना हो सकता है साथ ही अपने पदाधिकारियों को प्रोत्साहित करना व प्रशिक्षित करना भी संस्था का उद्धेश्य है।

संपादक